बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासी तूफान सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। 10 जुलाई 2025 को जस्टिस सुधांशु धूलिया और जॉयमाल्या बागची की बेंच ने SIR के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई की, जिसमें कांग्रेस, राजद, टीएमसी, और सीपीआई (एम) ने इस प्रक्रिया को ‘लोकतंत्र पर हमला’ करार देते हुए रोक लगाने की मांग की। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि SIR के जरिए मुस्लिम, दलित, और प्रवासी मजदूरों को मतदाता सूची से हटाने की साजिश रची जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘लोकतंत्र की जड़ों’ से जुड़ा मुद्दा बताते हुए मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई 2025 को तय की, लेकिन चुनाव आयोग (EC) की दलीलें सुनने के बाद SIR पर तत्काल रोक से इनकार कर दिया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और गोपाल शंकर नारायण ने जोरदार दलीलें दीं। नारायण ने कहा, “SIR में 11 दस्तावेज अनिवार्य करना भेदभावपूर्ण और गैरकानूनी है। यह प्रक्रिया न तो RP एक्ट में है और न ही इलेक्शन रूल्स में। 2003 के बाद मतदाता सूची में शामिल लोगों को फिर से दस्तावेज क्यों देने हों? यह मनमाना और पक्षपातपूर्ण है।”
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उन्होंने दावा किया कि मॉनसून और बाढ़ के बीच SIR लागू करना प्रवासी और गरीब मतदाताओं को वोटिंग से वंचित करने की साजिश है। चुनाव आयोग की ओर से पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने पक्ष रखा।
EC ने कहा, “11 दस्तावेजों की मांग का उद्देश्य मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना है। आधार कार्ड केवल पहचान पत्र है, नागरिकता का आधार नहीं। 60% मतदाताओं ने फॉर्म भर दिए हैं, और आधे से अधिक अपलोड हो चुके हैं।” EC ने कोर्ट से आग्रह किया कि ड्राफ्ट प्रकाशन पर रोक न लगाई जाए, वरना पूरी प्रक्रिया और नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव प्रभावित होंगे।
जस्टिस धूलिया ने EC से सवाल किया, “आपके अधिकार क्षेत्र को कोई चुनौती नहीं दे रहा, लेकिन SIR की प्रक्रिया और समय पर सवाल हैं। क्या यह नियमों के तहत है?” EC ने दावा किया कि यह संवैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इसे मनमाना और कानून के बाहर बताया। जस्टिस बागची ने कहा, “हम EC के काम में दखल नहीं देना चाहते, लेकिन यह मुद्दा वोटिंग के अधिकार से जुड़ा है।”
सुप्रीम कोर्ट ने SIR को ‘लोकतंत्र की जड़ों’ से जुड़ा मुद्दा बताया, क्योंकि यह मतदाताओं के वोटिंग अधिकार को प्रभावित कर सकता है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि SIR की सख्त शर्तें, जैसे 25 जुलाई तक 11 दस्तावेज जमा करना, बिहार के 4 करोड़ मतदाताओं, खासकर मुस्लिम (17.7%), दलित (16%), और प्रवासी मजदूरों के लिए असंभव हैं।
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गोपाल नारायण ने कहा, “हर साल मतदाता सूची की समीक्षा होती है। 2025 की समीक्षा हो चुकी है, तो SIR की क्या जरूरत?” EC ने जवाब दिया कि 2003 के बाद कई मतदाता सूचियों में त्रुटियां हैं, और SIR इन्हें सुधारने के लिए जरूरी है। हालांकि, कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर ड्राफ्ट सूची प्रकाशित हो गई और चुनाव अधिसूचना जारी हो गई, तो कोई भी कोर्ट इसे बदल नहीं सकता।
SIR विवाद ने बिहार की सियासत को गरमा दिया है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने X पर लिखा, “यह वोटबंदी की साजिश है। BJP और EC मिलकर गरीबों, दलितों और मुस्लिमों का वोट छीन रहे हैं।” कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा, “लोकतंत्र का गला घोंटने की कोशिश को जनता बर्दाश्त नहीं करेगी।” AIMIM नेता अख्तरुल इमाम ने इसे पसमांदा मुस्लिमों के खिलाफ साजिश बताया।