FII Outflow 2026: भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, रुपये की कमजोरी और Sensex में गिरावट को लेकर कांग्रेस ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस ने 5 अक्टूबर 2026 को जारी प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया कि जनवरी से सितंबर 2026 के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FIIs/FPI ने भारतीय बाजार से करीब ₹4.03 लाख करोड़ की पूंजी निकाल ली। कांग्रेस ने इसे देश की आर्थिक स्थिति और निवेश माहौल को लेकर गंभीर चिंता बताते हुए सरकार से जवाब मांगा है। हालांकि, विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे केवल घरेलू नीतियां ही जिम्मेदार नहीं हैं। मजबूत डॉलर, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमत और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी भारतीय बाजार पर दबाव डाल रही हैं।
FII Outflow 2026: विदेशी निवेशक भारत से पैसा क्यों निकाल रहे हैं?
Foreign Institutional Investors यानी FIIs और Foreign Portfolio Investors यानी FPI की भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली 2026 में बड़ा मुद्दा बन गई है। कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण भारत का निवेश माहौल कमजोर हुआ है और विदेशी पूंजी दूसरे देशों की ओर जा रही है। वहीं, बाजार की तस्वीर इससे कहीं ज्यादा जटिल है। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, डॉलर की मजबूती, महंगा क्रूड और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारक विदेशी निवेशकों के फैसलों को प्रभावित करते हैं। सितंबर 2026 में भी विदेशी निवेशकों ने भारतीय equities से बड़ी रकम निकाली। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सितंबर में FPIs की equity outflow करीब ₹35,861 करोड़ रही।
तीन दिन में ₹29,000 करोड़ की FII बिकवाली का दावा
कांग्रेस ने अपने बयान में दावा किया कि 29 सितंबर, 30 सितंबर और 1 अक्टूबर के दौरान ही विदेशी निवेशकों ने करीब ₹29,000 करोड़ की बिकवाली की। यह आंकड़ा बाजार में विदेशी पूंजी की निकासी को लेकर बढ़ती चिंता को दिखाता है। कांग्रेस ने सवाल उठाया कि अगर भारत विदेशी निवेश के लिए आकर्षक बाजार है, तो FIIs/FPI लगातार अपनी पूंजी क्यों निकाल रहे हैं? हालांकि, इस बिकवाली के पीछे वैश्विक बाजार की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
NSE कंपनियों में FPI हिस्सेदारी भी चर्चा में
कांग्रेस ने NSE-listed कंपनियों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घटने को भी सरकार की आर्थिक नीतियों से जोड़कर सवाल उठाए हैं। NSE के ownership data में भी FPI हिस्सेदारी में गिरावट का ट्रेंड दिखाई दिया है। मई 2026 में NSE-listed कंपनियों में FPI ownership करीब 15.8% के स्तर पर पहुंच गई थी, जिसे रिपोर्ट में 17 साल का निचला स्तर बताया गया था। विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी में यह गिरावट भारतीय शेयर बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत है, खासकर तब जब घरेलू निवेशक बाजार में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
मिडिल क्लास पर शेयर बाजार और टैक्स का दबाव?
कांग्रेस ने शेयर बाजार में निवेश करने वाले मिडिल क्लास निवेशकों को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा है।
पार्टी का कहना है कि करोड़ों भारतीय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शेयर बाजार में निवेश करते हैं। बाजार में गिरावट होने पर उनकी बचत और निवेश पर सीधा असर पड़ता है।
कांग्रेस ने STT और Capital Gains Tax को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए हैं।
मौजूदा नियमों के तहत:
- Short Term Capital Gains (STCG): 20%
- Long Term Capital Gains (LTCG): 12.5%
- इसके अलावा लागू नियमों के अनुसार Securities Transaction Tax (STT) भी देना होता है।
कांग्रेस इसे मिडिल क्लास निवेशकों पर अतिरिक्त टैक्स बोझ के रूप में पेश कर रही है।
मनमोहन सिंह सरकार का जिक्र क्यों आया?
कांग्रेस ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के दौर की आर्थिक नीतियों का उदाहरण दिया। पार्टी ने कहा कि 1990 के दशक के आर्थिक संकट के बाद भारत ने विदेशी निवेश के लिए अपनी अर्थव्यवस्था और पूंजी बाजार को ज्यादा खोला। कांग्रेस के मुताबिक FIIs के लिए नीतियां बनाने और विदेशी पूंजी आकर्षित करने से भारतीय अर्थव्यवस्था तथा शेयर बाजार को मजबूती मिली। इसी तुलना के आधार पर कांग्रेस ने सवाल उठाया कि आज विदेशी निवेशक भारत से पूंजी क्यों निकाल रहे हैं।
Sensex गिरावट पर कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरा
कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 2024 के शेयर बाजार से जुड़े बयानों का भी उल्लेख किया। पार्टी ने दावा किया कि सितंबर 2024 में Sensex करीब 85,836 के स्तर पर था, जबकि सितंबर 2026 के अंत में यह करीब 72,480 पर बंद हुआ। कांग्रेस का आरोप है कि जिन निवेशकों ने 2024 में बाजार में पैसा लगाया, उन्हें अब नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
हालांकि, शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव को किसी एक राजनीतिक बयान या सरकार की नीति से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। वैश्विक ब्याज दरें, डॉलर, कच्चा तेल, विदेशी पूंजी की निकासी और भू-राजनीतिक जोखिम भी Sensex और Nifty की चाल पर असर डालते हैं।
कमजोर रुपया बना दूसरा बड़ा मुद्दा
कांग्रेस ने भारतीय रुपया बनाम डॉलर को लेकर भी मोदी सरकार से जवाब मांगा है। पार्टी ने प्रधानमंत्री मोदी के 2012 और 2013 के पुराने बयानों का हवाला देते हुए सवाल किया कि डॉलर के मुकाबले रुपये पर इतना दबाव क्यों बना हुआ है। 5 अक्टूबर 2026 को रुपया करीब ₹96.25 प्रति डॉलर के स्तर पर कारोबार कर रहा था। सितंबर के अंत में भी रुपया ₹96 के आसपास था। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि कमजोर रुपया आयात को महंगा कर सकता है और इसका असर अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है। वहीं, रुपये की कमजोरी के पीछे मजबूत अमेरिकी डॉलर, कच्चे तेल की कीमत और विदेशी निवेशकों की बिकवाली जैसे बाहरी और बाजार से जुड़े कारण भी महत्वपूर्ण हैं।
पेट्रोल-डीजल की कीमत पर भी सरकार से सवाल
कांग्रेस ने पेट्रोल-डीजल की कीमत और कच्चे तेल को लेकर भी केंद्र सरकार को घेरा। पार्टी ने पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का हवाला देते हुए पूछा कि आज रुपये की कमजोरी और ईंधन की कीमतों को लेकर सरकार की नीति क्या है। कांग्रेस ने कहा कि सरकार को पेट्रोल-डीजल की कीमतों और रुपये की कमजोरी के बीच संबंध पर जनता के सामने स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
कांग्रेस की मोदी सरकार से 5 बड़ी मांगें
कांग्रेस ने प्रेस विज्ञप्ति में सरकार के सामने कई सवाल रखे हैं:
1. रुपये की कमजोरी:
डॉलर के मुकाबले रुपये पर बने दबाव को लेकर सरकार जवाब दे।
2. FII/FPI Outflow:
विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा क्यों निकाल रहे हैं?
3. 2026 में लगातार बिकवाली:
FIIs/FPI की लगातार बिकवाली के पीछे सरकार की नजर में मुख्य कारण क्या हैं?
4. पेट्रोल-डीजल की कीमत:
कच्चे तेल और रुपये की स्थिति के बावजूद ईंधन कीमतों को लेकर सरकार की नीति क्या है?
5. निवेशकों के नुकसान की जिम्मेदारी:
2024 में शेयर बाजार में निवेश को लेकर दिए गए बयानों के बाद बाजार में पैसा लगाने वाले निवेशकों के नुकसान पर सरकार क्या कहती है?
FII Outflow और Rupee Crisis पर अब सरकार के जवाब का इंतजार
FII Outflow 2026, कमजोर रुपया और शेयर बाजार की गिरावट ने भारतीय अर्थव्यवस्था और निवेशकों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। कांग्रेस ने इन मुद्दों को लेकर मोदी सरकार पर आर्थिक कुप्रबंधन का आरोप लगाया है, जबकि विदेशी निवेशकों की बिकवाली को समझने के लिए वैश्विक बाजार की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। अब बड़ा सवाल यही है कि FIIs/FPI भारत से इतनी बड़ी मात्रा में पूंजी क्यों निकाल रहे हैं, रुपये पर दबाव कब कम होगा और शेयर बाजार में विदेशी निवेश की वापसी कब होगी? इन मुद्दों पर केंद्र सरकार की ओर से आने वाला जवाब राजनीतिक और आर्थिक, दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण होगा। नोट: इस खबर में कांग्रेस की ओर से लगाए गए आरोपों को आरोप/दावे के रूप में प्रस्तुत किया गया है। FII/FPI flows और बाजार के आंकड़े संबंधित उपलब्ध market data के संदर्भ में दिए गए हैं।