नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर दिए अपने संबोधन में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और राजनीतिक आंदोलनों को लेकर महत्वपूर्ण बातें कहीं। नागपुर में RSS के विजयादशमी कार्यक्रम के दौरान शस्त्र पूजन के बाद बोलते हुए उन्होंने फ्रांस और अल्बानिया की घटनाओं का उल्लेख किया और दावा किया कि भारत में भी इसी तरह की स्थिति पैदा करने की कोशिशें हो रही हैं। उनके इस बयान में लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन की भूमिका, राजनीतिक स्वार्थ और भारतीय समाज को एकजुट रखने की जरूरत जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
विजयादशमी पर मोहन भागवत ने राष्ट्रीय एकता को लेकर क्या कहा?
RSS सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने विजयादशमी भाषण में कहा कि भारतीय समाज में विभाजन बढ़ने से देश की सामूहिक शक्ति कमजोर होती है। उन्होंने भाषा, जाति, संप्रदाय और समुदाय के आधार पर होने वाले भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पहचान और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने पर जोर दिया। कार्यक्रम की शुरुआत में मोहन भागवत ने शस्त्र पूजन किया और RSS के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि अर्पित की। अपने संबोधन में उन्होंने भारतीय संस्कृति, पारंपरिक मूल्यों और सामाजिक समरसता के महत्व पर भी प्रकाश डाला। संत रविदास के संदेश का उल्लेख करते हुए भागवत ने कर्तव्य के प्रति निष्ठा, भक्ति और समाज में आपसी सम्मान की भावना को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, लोगों के बीच विश्वास और अपनापन बनाए रखना राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए जरूरी है।
‘फ्रांस जैसी कोशिशें भारत में भी हो रही हैं’: राजनीतिक आंदोलनों पर टिप्पणी
मोहन भागवत ने फ्रांस और अल्बानिया की घटनाओं का जिक्र करते हुए दावा किया कि भारत में भी इसी तरह की स्थिति पैदा करने के प्रयास हो रहे हैं। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन और असहमति को स्वाभाविक बताते हुए कहा कि आंदोलनों का उद्देश्य समस्याओं का समाधान तलाशना होना चाहिए। RSS प्रमुख ने आरोप लगाया कि कुछ लोग राजनीतिक स्वार्थ, लोकप्रियता हासिल करने और सत्ता परिवर्तन की महत्वाकांक्षा के लिए जनभावनाओं का इस्तेमाल करते हैं। उनके मुताबिक, केवल सरकार बदलने से समाज की सभी समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। उन्होंने संवाद, आपसी समझ और सामूहिक प्रयासों को सामाजिक चुनौतियों से निपटने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उनके इस बयान में लोकतंत्र, राजनीतिक आंदोलनों और राष्ट्रीय हित के बीच संतुलन बनाए रखने का संदेश प्रमुख रहा।
भारत की प्रगति और वैश्विक भूमिका पर RSS प्रमुख का संदेश
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में भारत की बढ़ती प्रगति और वैश्विक महत्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश के विकास के साथ सामाजिक संतुलन और सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने भौतिकवाद, व्यक्तिवाद और जरूरत से ज्यादा उपभोग जैसी प्रवृत्तियों से जुड़ी सामाजिक चुनौतियों पर चिंता जताई। उनके अनुसार, पर्यावरण संरक्षण, परिवार व्यवस्था को मजबूत करना, विभिन्न समुदायों के बीच सद्भाव बनाए रखना और नई पीढ़ी में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। भागवत ने भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक समरसता को इन चुनौतियों से निपटने का एक महत्वपूर्ण आधार बताया। उनके विचार में विकास के साथ सामाजिक जिम्मेदारी और सामूहिक हित को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
हिंदू समाज और भारत को बांटने की कोशिशों पर जताई चिंता
RSS प्रमुख ने आरोप लगाया कि कुछ ताकतें भारत, हिंदू समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विभाजित करने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने भारत के प्रति निष्ठा को स्वाभाविक भावना बताते हुए कहा कि इसे किसी निजी लाभ या शर्त से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भागवत ने यह भी कहा कि हिंदू समाज को संगठित और मजबूत करने का प्रयास दूसरे धर्मों के सम्मान या राष्ट्रीय एकता के खिलाफ नहीं है। उनके अनुसार, आपसी सम्मान, सामाजिक सद्भाव और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने से देश की एकता मजबूत हो सकती है।
कैप्टन स्मित मच्छार का भी किया उल्लेख
अपने विजयादशमी संबोधन में मोहन भागवत ने कैप्टन स्मित मच्छार के कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में किसी व्यक्ति का आचरण उसके जीवन में गहराई से स्थापित मूल्यों और संस्कारों को दर्शाता है।
मोहन भागवत के विजयादशमी भाषण की प्रमुख बातें
RSS प्रमुख मोहन भागवत के विजयादशमी संबोधन में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता, राजनीतिक आंदोलनों, भारतीय संस्कृति और देश की वैश्विक भूमिका जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। फ्रांस और अल्बानिया की घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारत में भी इसी तरह की कोशिशें होने का दावा किया। उनके संबोधन का मुख्य संदेश समाज में विभाजन से बचने, लोकतांत्रिक आंदोलनों को समाधान-केंद्रित बनाने और आपसी विश्वास को मजबूत करने की जरूरत पर केंद्रित रहा।