बिहार में 2025 विधानसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच नौकरशाहों का राजनीति में उतरने का सिलसिला तेज हो गया है। VRS लेकर कई IAS और IPS अधिकारी सियासी मैदान में कूद रहे हैं। हाल के महीनों में कम से कम तीन वरिष्ठ नौकरशाहों ने VRS लिया और राजनीति में प्रवेश की अटकलों को हवा दी। इनमें से कुछ ने जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) जैसे दलों से टिकट की दावेदारी शुरू कर दी है। यह ट्रेंड बिहार की बदलती सियासत और नौकरशाहों की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है।
पटना में शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव, 1991 बैच के
IAS डॉ. एस. सिद्धार्थ ने 22 जुलाई 2025 को VRS लिया। सूत्रों के मुताबिक, वे JD(U) के टिकट पर नवादा से चुनाव लड़ सकते हैं।

इससे पहले,
पूर्व IAS RCP सिंह ने Aap Sabki Awaz (Rashtriya) पार्टी बनाई और कुर्मी (OBC) वोटों पर नजर रखी।
पूर्व IPS शिवदीप वामनराव लांडे ने भी VRS लेकर हिंद सेना पार्टी बनाई, जो "स्वच्छ" राजनीति का दावा करती है।

2014 में, बिहार और झारखंड में 13 पूर्व IAS-IPS ने लोकसभा चुनाव लड़ा था, जिसमें
राज कुमार सिंह (Ara, BJP) और
आर.एस. पांडे (वाल्मीकिनगर, BJP) सफल रहे।
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क्यों चुन रहे हैं नौकरशाह राजनीति?
नौकरशाहों का सियासत में आना नया नहीं है। 2019 में आंध्र प्रदेश में 20 से अधिक IAS-IPS ने VRS लिया था। विशेषज्ञों का कहना है कि नौकरशाह राजनीति में इसलिए आकर्षित हो रहे हैं क्योंकि वे सत्ता और नीति-निर्माण में सीधे हिस्सा लेना चाहते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं, "लंबे समय तक नेताओं के अधीन काम करने के बाद, नौकरशाह अब आदेश लेने की बजाय सत्ता संभालना चाहते हैं।" बिहार में जातिगत समीकरणों और सीमित सरकारी नौकरियों (NITI Aayog, 2025: 3.9% बेरोजगारी) ने भी इस ट्रेंड को बढ़ावा दिया।
बिहार में जाति और विकास के मुद्दे हमेशा हावी रहे हैं। RCP सिंह (कुर्मी) और शिवदीप लांडे जैसे नए नेता जातिगत वोटों के साथ-साथ "स्वच्छ" शासन का नारा दे रहे हैं। प्राशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भी हाल के उपचुनाव में 10% वोट शेयर हासिल कर महागठबंधन को नुकसान पहुंचाया। हालांकि, RJD नेता तेजस्वी यादव ने इन नए दलों को "वोट कटवा" करार दिया, जो NDA को फायदा पहुंचा सकता है। BJP और JD(U) के बीच तनाव भी दिख रहा है, खासकर सीट बंटवारे और नीतीश कुमार की उम्र (74) और स्वास्थ्य को लेकर।
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नौकरशाहों की सियासी एंट्री बिहार की राजनीति को और जटिल बना रही है। इनमें से ज्यादातर अपनी प्रशासनिक छवि और जातिगत आधार का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि नई पार्टियां और नेताओं को स्थापित दलों जैसे RJD, JD(U), और BJP से मुकाबला करना आसान नहीं होगा।
तेजस्वी यादव की युवा अपील और नीतीश की सुषासन छवि के सामने इन नए चेहरों को अपनी जगह बनानी होगी।
क्या ये नौकरशाह बिहार की सियासत में नया रंग लाएंगे, या सिर्फ "वोट कटवा" बनकर रह जाएंगे? यह 2025 का चुनाव तय करेगा।