राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने दूसरी बार भारत की घटती जन्मदर पर चिंता जताई है। गुरुवार को उन्होंने युवाओं से कहा कि जल्दी विवाह कर “हम दो, हमारे तीन” का नारा अपनाना चाहिए। उनका तर्क है कि भारत की भावी ताक़त को सुरक्षित रखने के लिए परिवारों को बढ़ाना ज़रूरी है।
लेकिन उनके इन बयानों में स्पष्ट विरोधाभास नज़र आता है। जहाँ एक ओर वे परिवार बड़े करने की सलाह देते हैं, वहीं दूसरी ओर वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सेवाएँ लगातार महँगी और असुलभ होती जा रही हैं। आज बच्चों की पढ़ाई के लिए माता-पिता को क़र्ज़ लेना पड़ता है, इलाज के लिए लोग घर गिरवी रखते हैं या महँगे लोन उठाते हैं। ऊपर से लगातार बढ़ती महँगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। ऐसे हालात में सीमित आय वाले परिवार तीन बच्चों का बोझ कैसे उठा पाएँगे?
अगर भागवतजी वास्तव में चाहते हैं कि उनकी सलाह पर अमल हो, तो ज़िम्मेदारी भाजपा शासित 15 राज्यों और NDA सहयोगियों के छह राज्यों पर है कि वे सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करें। केवल लोगों से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील करना और ज़मीनी सुविधाओं की उपेक्षा करना एक खोखला निर्देश है। सरकार को चाहिए कि नागरिकों को निजी संस्थानों की लूट से बचाए और गुणवत्तापूर्ण, सस्ती सरकारी सेवाएँ सुनिश्चित करे।
दूसरे देशों और समुदायों से सीख ली जा सकती है। पारसी समाज, जिसकी आबादी लगातार घट रही है, ने 2013 में एक योजना शुरू की—दूसरे बच्चे पर हर महीने ₹3,000 और तीसरे बच्चे पर ₹5,000 की सहायता, जब तक बच्चा 18 वर्ष का न हो जाए। इसी तरह चीन में भी जन्मदर घट रही है, वहाँ सरकार ने हर दंपति को प्रत्येक बच्चे पर तीन वर्ष की आयु तक ₹44,000 वार्षिक सहायता देने की घोषणा की है।
हर दंपति संतान चाहता है, लेकिन सबसे बड़ी चिंता बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च है। यही कारण है कि भारत में पहले से ही लगभग 10 प्रतिशत परिवार एक ही संतान पर रुक जाते हैं। इसलिए केवल “परिवार बड़ा करो” कह देना काफ़ी नहीं है, साथ ही सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को भी बढ़ाना होगा।
अगर भागवतजी सचमुच युवा पीढ़ी को विश्वास दिलाना चाहते हैं, तो उन्हें भाजपा शासित राज्यों को आदेश देना चाहिए कि वे सामाजिक सुरक्षा प्रणाली लागू करें, शिक्षा और स्वास्थ्य को सुलभ बनाएं और निजी क्षेत्र की मनमानी पर रोक लगाएं। तभी बड़े परिवार का विचार व्यवहारिक और विश्वसनीय बन सकेगा।
अन्यथा, उनके बयान केवल विरोधाभासी रहेंगे—नियत शायद अच्छी हो, परंतु देश की वास्तविक परिस्थितियों से पूरी तरह कटा हुआ।