बिहार की विधानसभा चुनाव 2025 केवल सत्ता का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह विश्वास, नेतृत्व और राजनीतिक दिशा का भी प्रश्न है। पिछले दो दशकों से नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में स्थिरता का प्रतीक बने रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या वे एक बार फिर NDA की अगुवाई में सत्ता में लौटेंगे, या बिहार की राजनीति किसी नए मोड़ पर जाएगी?
NDA की स्थिति और अंदरूनी गणितNDA के भीतर उत्साह के साथ-साथ तनाव भी स्पष्ट है। भाजपा और जेडीयू दोनों 101-101 सीटों पर लड़ रही हैं, जबकि पासवान गुट को 29 सीटें दी गई हैं। ऐसे में यदि NDA को बहुमत मिलता है, तो मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
भाजपा अब बिहार में अपना स्वतंत्र राजनीतिक कद स्थापित करना चाहती है। नीतीश कुमार की लंबी यात्रा और उनका प्रशासनिक अनुभव NDA के लिए अब भी अहम पूंजी हैं, परंतु पार्टी के भीतर नई पीढ़ी के नेताओं को आगे लाने की मांग तेज होती जा रही है।
महागठबंधन के लिए यह चुनाव अस्तित्व की परीक्षा बन गया है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी ने युवा वोटरों में अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश की है, लेकिन संगठनात्मक कमजोरी और कांग्रेस के घटते प्रभाव ने विपक्ष को नुकसान पहुंचाया है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव बिहार में राजनीतिक पुनर्जीवन का आखिरी अवसर माना जा रहा है।
नए खिलाड़ी की एंट्रीप्रशांत किशोर की ‘जन सुराज पार्टी’ जैसी नई ताकतों ने इस बार चुनाव में कदम रखा है। हालांकि उनका प्रभाव सीमित है, परंतु वे यह संकेत दे रही हैं कि बिहार की राजनीति में जनता विकल्प चाहती है। बेशक, जातीय समीकरण अभी भी प्रभावी हैं, लेकिन मतदाता अब विकास, शिक्षा, रोजगार और सुशासन को भी प्राथमिकता दे रहे हैं।
चुनाव आयोग पर सवालचुनाव प्रक्रिया के दौरान आयोग की तटस्थता पर कुछ बयानबाजी को लेकर सवाल उठे हैं। बिहार जैसे संवेदनशील राज्य में, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता लोकतांत्रिक विश्वास के लिए बेहद अहम है। मतदाताओं को निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया की अपेक्षा है।
मतदाता का मिज़ाजइस बार मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज हुई है। ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ शहरी मतदाताओं ने भी बड़ी संख्या में वोट डाले हैं। महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से बढ़ी है। यह चुनाव केवल जाति-आधारित नहीं, बल्कि विकास-आधारित राजनीति की ओर संकेत करता है।
निष्कर्षबिहार की जनता ने इस चुनाव को बदलाव का अवसर बना दिया है। अगर NDA को बहुमत मिलता है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी नीतीश कुमार के पास जाती है या भाजपा किसी नए चेहरे पर दांव लगाती है।
एक बात तय है—बिहार अब वादों से नहीं, बल्कि परिणामों से भरोसा करना चाहता है। यह चुनाव दिखा रहा है कि राज्य की राजनीति अब नई सोच और नई दिशा की तलाश में है।