दिल्ली में हुए दो धमाकों में दस निर्दोष लोगों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह सिर्फ आतंक की वारदात नहीं, बल्कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था की गहरी नाकामी का भी प्रमाण है। राजधानी में उच्च अलर्ट के बावजूद आत्मघाती हमलावरों का पहुंच जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
धमाके से ठीक एक दिन पहले गुजरात एटीएस ने दो संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार किया था, जिन्होंने लालकिला क्षेत्र की रेकी की थी। फिर भी, लालकिला और उसके आसपास सुरक्षा क्यों नहीं बढ़ाई गई? क्या राज्य और केंद्र की खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी एक बार फिर हमारी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई?
इससे पहले खबरें थीं कि जैश-ए-मोहम्मद का सरगना मसूद अजहर बांग्लादेश में आतंकी लॉन्चपैड तैयार कर रहा है, ताकि भारत में हमला किया जा सके। अगर ऐसी इंटेलिजेंस इनपुट्स पहले से मौजूद थीं, तो राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा क्यों नहीं किया गया? क्या खुफिया चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया?
सबसे अहम सवाल यह है कि आईईडी से भरी कार दिल्ली जैसे संवेदनशील इलाके में कैसे दाखिल हो गई? राजधानी में कई सुरक्षा जांच चौकियों के बावजूद यह चूक कैसे हुई? जब देश के पास अनुभवी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और सशक्त गृह मंत्री हैं, तब ऐसी बड़ी विफलता अस्वीकार्य है।
पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत आतंकियों के ठिकानों को नष्ट करने का दावा किया था। अगर वे ठिकाने वास्तव में खत्म हुए थे, तो आतंकी नेटवर्क फिर से सक्रिय कैसे हो गए? क्या स्लीपर सेल फिर से जाग उठे हैं, या कभी पूरी तरह खत्म ही नहीं हुए थे?
क्या यह हमला सिर्फ आतंकी वारदात है या भारत को नए स्तर के युद्ध में फंसाने की साजिश? सरकार पहले भी कह चुकी है कि ऑपरेशन सिंदूर समाप्त नहीं हुआ, बस रुका हुआ है। क्या यह हमला भारत की सहने की क्षमता पर परख है?
आखिरकार, असली सवाल यही है — क्या नफरत ही आतंकवाद की जड़ है, या पाकिस्तान की प्रॉक्सी वार मशीनरी एक बार फिर भारत के खिलाफ सफल हो रही है? दिल्ली की यह त्रासदी केवल शोक का नहीं, बल्कि जवाबदेही और ठोस कार्रवाई का समय है। अब बयानबाजी नहीं, नतीजे चाहिए।