डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट, 91 के पार
भारत-अमेरिका ट्रेड डील अटकी, विदेशी निवेश निकासी से बढ़ा दबाव

डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट

डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट
भारतीय रुपया मंगलवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 91 के स्तर से नीचे फिसल गया और लगातार चौथे कारोबारी सत्र में अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता और लगातार विदेशी निवेशकों की निकासी ने रुपये पर भारी दबाव डाला।
रुपया 91.03 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गया, जो सोमवार को बने 90.78 के पिछले रिकॉर्ड को भी पार कर गया। बाजार जानकारों के अनुसार, यह गिरावट नॉन-डिलीवेरेबल फॉरवर्ड्स (NDF) बाजार में पोजिशन की मैच्योरिटी से जुड़ी डॉलर की मांग और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली के कारण आई। बीते पांच कारोबारी सत्रों में रुपया डॉलर के मुकाबले 1% से अधिक कमजोर हो चुका है।
वर्ष 2025 में अब तक रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है, जो डॉलर के मुकाबले करीब 6% तक टूट चुका है। अमेरिकी टैरिफ के दबाव और भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते के अभाव को इस गिरावट का प्रमुख कारण माना जा रहा है। भारत इस समय अमेरिका के साथ ट्रेड डील से वंचित एकमात्र बड़ी अर्थव्यवस्था है।
रुपये की लगातार कमजोरी का असर भारत के 5.2 ट्रिलियन डॉलर के शेयर बाजार पर भी दिखने लगा है। एनएसई निफ्टी 50 इंडेक्स नवंबर में बने रिकॉर्ड उच्च स्तर से करीब 1.7% तक फिसल चुका है, हालांकि बाद में इसमें आंशिक रिकवरी देखी गई। दिसंबर में ही वैश्विक निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से लगभग 1.6 अरब डॉलर निकाल लिए, जिससे पिछले दो महीनों की पूंजी प्रवाह उलट गई। निवेशकों ने घरेलू बॉन्ड बाजार से भी पैसा निकाला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एशिया में सबसे कड़े अमेरिकी टैरिफ ने निवेशकों की धारणा को कमजोर किया है और बाजार भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की दिशा में किसी ठोस प्रगति का इंतजार कर रहा है। वैश्विक अनिश्चितता और घरेलू पूंजी प्रवाह की चुनौतियों ने रुपये पर दबाव और बढ़ा दिया है।
हालांकि कमजोर रुपया कुछ सेक्टरों के लिए फायदेमंद भी साबित हुआ है। खासतौर पर आईटी कंपनियों को इसका लाभ मिला है, जिनकी कमाई का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। निफ्टी आईटी इंडेक्स सितंबर के अंत से अब तक करीब 14% चढ़ चुका है, जो रुपये की गिरावट के दौर के साथ मेल खाता है।
विश्लेषकों के अनुसार, कमजोर रुपया आईटी, फार्मा और मेटल सेक्टर के शेयरों के लिए सकारात्मक रहता है, जबकि बैंकिंग, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों पर इसका नकारात्मक असर पड़ता है। कुल मिलाकर, मुद्रा कमजोरी, सीमित बॉन्ड यील्ड और धीमी आय वृद्धि के चलते शेयर बाजार में चयनात्मक निवेश की रणनीति जरूरी मानी जा रही है।