2001 भुज भूकंप: 25 साल बाद भी जिंदा है वो दर्द
26 जनवरी की सुबह 8:46 बजे दो मिनट में 13,805 जानें गईं, स्कूल-स्कूल मलबे में दब गया

आज 'स्मृतिवन' हर नाम के साथ याद दिलाता है उस तबाही को

आज 'स्मृतिवन' हर नाम के साथ याद दिलाता है उस तबाही को
आज पूरा देश 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, तिरंगा फहरा रहा है, राष्ट्रगान गूंज रहा है। लेकिन गुजरात के कच्छ और भुज में आज का दिन सिर्फ उत्सव नहीं, एक गहरी टीस लेकर आता है। ठीक 25 साल पहले, 26 जनवरी 2001 को सुबह 8:46 बजे 7.7 तीव्रता का भूकंप आया था। सिर्फ दो मिनट में 13,805 से ज्यादा लोगों की जान चली गई, 1.67 लाख लोग घायल हुए, 3.97 लाख घर तबाह हो गए। अंजार में तिरंगा यात्रा निकाल रहे स्कूली बच्चों पर पूरी दीवार गिर गई, सैकड़ों मासूम एक साथ दब गए। भुज शहर का 90% हिस्सा जमींदोज हो गया। आज भी जब कैलेंडर में 26 जनवरी आता है, तो भुज के बुजुर्ग रात को सो नहीं पाते। घड़ी की सुई जैसे ही 8:46 पर पहुंचती है, दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं।
दो मिनट ने सब कुछ बदल दिया सुबह 8:46 बजे – बच्चे स्कूल में तिरंगा फहराने की तैयारी कर रहे थे, बड़े लोग गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम में शामिल होने वाले थे। अचानक धरती कांपी। घर हिलने लगे, दीवारें गिरने लगीं। लोग चीखते हुए बाहर भागे, लेकिन मलबा इतना तेज गिरा कि हजारों लोग उसी में दब गए। भुज में अस्पताल, स्कूल, मंदिर, बाजार – सब कुछ मलबे में बदल गया। भचाऊ और अंजार तालुका के सैकड़ों गांव पूरी तरह खत्म हो गए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 13,805 मौतें हुईं, लेकिन स्थानीय लोग कहते हैं कि संख्या इससे कहीं ज्यादा थी।
स्मृतिवन – हर नाम एक जख्म आज भुज के भुजियो हिल पर बना 'स्मृतिवन' उस त्रासदी की सबसे बड़ी गवाही है। यहां 13,000 से ज्यादा नामों की दीवारें हैं – हर नाम के साथ एक कहानी, एक अधूरी जिंदगी। स्मृतिवन का म्यूजियम आज की पीढ़ी को बताता है कि मंजर कितना भयानक था। यहां हर साल 26 जनवरी को मौन रखा जाता है, मोमबत्तियां जलती हैं और उन बच्चों, मां-बाप, भाई-बहनों को याद किया जाता है जो उस दिन हमेशा के लिए सो गए।
कैसे हुआ था हादसा?
25 साल बाद आज भी सवाल
भुज ने फिर से उठ खड़े होने की मिसाल दी है। आज के भुज में ज्यादातर इमारतें भूकंपरोधी हैं, सड़कें चौड़ी हैं, अस्पताल मजबूत हैं। लेकिन 26 जनवरी की सुबह की वो यादें आज भी लोगों के दिल में जिंदा हैं। जब तिरंगा फहरता है, तो कई आंखें नम हो जाती हैं – उन बच्चों के लिए, उन मां-बाप के लिए, जो उस दिन गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी में थे और मलबे में हमेशा के लिए सो गए।
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आज जब देश तिरंगा फहरा रहा है, तो भुज के लोग भी फहरा रहे हैं – लेकिन उनके दिल में एक सवाल हमेशा रहता है: "क्या हम ऐसी तबाही से बच सकते हैं?"