पाकिस्तान से बात? POK के बिना असंभव: भारत
इस्लामाबाद बातचीत चाहता है, लेकिन नई दिल्ली का कहना—पहले POK और आतंकवाद का समाधान
पाकिस्तान ऑक्युपाइड कश्मीर और भारतीय सिमावर्ती इलाका
पाकिस्तान ऑक्युपाइड कश्मीर और भारतीय सिमावर्ती इलाका
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक दार ने नई दिल्ली को बातचीत का संदेश देकर ज़ैतून की टहनी बढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन भारत की स्थिति बिलकुल साफ़ है—पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) और सीमापार आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई के बिना कोई वार्ता संभव नहीं।
मीडिया से बातचीत में दार ने कहा कि पाकिस्तान “सम्मानजनक और गरिमामय तरीके से” भारत के साथ “कंपोज़िट डायलॉग” के लिए तैयार है, जिसमें कश्मीर सहित सभी मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। लेकिन उन्होंने यह भी दोहराया कि “पाकिस्तान बातचीत के लिए भीख नहीं मांगेगा।” उनके ये बयान 2003 में परवेज़ मुशर्रफ़ के समय शुरू किए गए कंपोज़िट डायलॉग फ्रेमवर्क की याद दिलाते हैं, जिसमें आठ अहम मुद्दों को शामिल किया गया था। यह प्रक्रिया 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद ठप पड़ गई और फिर कभी पूरी तरह बहाल नहीं हुई।
दार ने आगे दावा किया कि पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति को “वैश्विक स्तर पर मान्यता” मिली है और इस्लामाबाद को सक्रिय व संवाद के लिए इच्छुक माना गया है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान ने किसी मध्यस्थता की मांग नहीं की, लेकिन वह तटस्थ स्थान पर बैठक को तैयार है।
लेकिन भारत का रुख अडिग है। नई दिल्ली के लिए यह महज़ “जेस्चर डिप्लोमेसी” या औपचारिकता का विषय नहीं, बल्कि मूलभूत प्रश्न है। जब तक पाकिस्तान कश्मीर पर अपना ग़ैरकानूनी कब्ज़ा छोड़कर और आतंकवाद को बढ़ावा देना बंद नहीं करता, तब तक किसी भी तरह की शांति वार्ता को खोखला दिखावा माना जाएगा। भारत लगातार कहता आया है कि POK की वापसी और आतंकवाद के अंत के अलावा किसी अन्य मुद्दे पर बातचीत का कोई सवाल ही नहीं।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या इस्लामाबाद की यह पहल रिश्तों को रीसेट करने की सच्ची कोशिश है, या फिर केवल अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने लचीलापन दिखाने की रणनीतिक चाल? भारत के नज़रिए से यह पुल बनाने का प्रयास कम और जनसंपर्क का खेल ज़्यादा नज़र आता है।
जब तक पाकिस्तान अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार कर क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने की भूमिका पर लगाम नहीं लगाता, तब तक भारत के संवाद के द्वार बंद ही रहेंगे। वार्ता का रास्ता मीडिया के बयानों से नहीं, बल्कि ठोस कदमों—आतंकी ढांचे को ध्वस्त करने और POK पर भारत के वैध अधिकार को मानने—से होकर जाएगा। इसके बिना सब कुछ सिर्फ़ कूटनीतिक नाटक ही है ।