बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले चल रहा SIR अभियान अब ‘कुत्तों’ की भेंट चढ़ गया है! जी हां, पटना के मसौढ़ी प्रखंड में एक कुत्ते को ID जारी कर दिया गया, जिसकी तस्वीर और डिटेल्स—
‘पिता: कुत्ता बाबू’—सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। यह ‘महान’ उपलब्धि बिहार के मतदाता सत्यापन की गंभीरता पर सवाल उठा रही है।
आखिर, जब कुत्ते को वोटर ID मिल सकता है, तो इंसानों की क्या गारंटी?
बिहार SIR का ‘कुत्ता-कांड
मसौढ़ी में स्थानीय प्रशासन ने एक कुत्ते की तस्वीर और नाम के साथ आवासीय प्रमाण पत्र जारी कर दिया। दस्तावेज में
कुत्ते का नाम ‘रेक्स’ और पिता का नाम ‘कुत्ता बाबू’ दर्ज है। यह प्रमाण पत्र SIR अभियान के तहत आवास सत्यापन के लिए जारी किया गया था, लेकिन अब यह इंटरनेट पर हंसी और आलोचना का विषय बन गया है।
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चुनाव आयोग का दावा है कि SIR से फर्जी वोटरों को हटाया जा रहा है। लेकिन कुत्ते को प्रमाण पत्र मिलने की घटना ने इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर ठहाका लगाया है। RJD नेता तेजस्वी यादव ने तंज कसते हुए कहा, “
अब कुत्ते भी वोट डालेंगे, बस NDA की जीत सुनिश्चित हो!”

वहीं, BJP ने इसे “
मानवीय भूल” करार दिया। स्थानीय अधिकारी ने जांच का आश्वासन दिया है, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या यह भूल थी या जानबूझकर सिस्टम की खामियों को उजागर करने की कोशिश?
सोशल मीडिया पर Meme War
X पर #KuttaVoterID ट्रेंड कर रहा है, जिसमें यूजर्स ने मसौढ़ी प्रशासन की खिंचाई की है। एक यूजर ने लिखा, “बिहार में कुत्ते को ID, इंसानों को लाइन में खड़ा करो!” दूसरों ने इसे SIR की “विश्वस्तरीय” दक्षता का मजाक उड़ाया। यह घटना 2019 के उस मामले की याद दिलाती है, जब यूपी में एक गधे को वोटर ID मिला था। क्या बिहार अब उस रिकॉर्ड को तोड़ने की राह पर है?
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क्या है असली मुद्दा?
SIR अभियान में 52.30 लाख मतदाताओं के पते गलत पाए गए, जिसके बाद विपक्ष ने इसे “वोटबंदी” करार दिया। इस कुत्ता-कांड ने उन दावों को और हवा दी कि यह प्रक्रिया भेदभावपूर्ण और अव्यवस्थित है। सुप्रीम कोर्ट में RJD और कांग्रेस की याचिकाएं लंबित हैं, जो SIR को रद्द करने की मांग कर रही हैं। अब यह सवाल उठता है कि क्या बिहार का लोकतंत्र “कुत्तों” के भरोसे चल रहा है?
यह वायरल घटना बिहार SIR की गंभीर खामियों को उजागर करती है। अगर एक कुत्ता वोटर बन सकता है, तो असली मतदाताओं का क्या हाल होगा? मसौढ़ी का यह ‘कुत्ता-कांड’ न केवल हंसी का पात्र है, बल्कि बिहार चुनाव से पहले सियासी तूफान खड़ा कर सकता है। क्या आप मानते हैं कि यह सिर्फ मजाक है, या लोकतंत्र पर सवाल?