राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने बुधवार को संसद में केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने 'ऑप सिंदूर' पर सरकार की प्रतिक्रिया और भारतीय सेना के बलिदान को राजनीतिकरण करने को लेकर निशाना साधा। झा ने जम्मू-कश्मीर में पहलगाम आतंकी हमले और सीमा पार गोलीबारी में जान गंवाने वालों को नजरअंदाज करने के लिए केंद्र की आलोचना की।
राज्यसभा में 'ऑप सिंदूर' पर बहस के दौरान झा ने कहा, "पहलगाम हमला पीड़ित परिवारों का निजी दर्द नहीं, बल्कि पूरे देश का दुख है। उरी और पहलगाम जैसे आतंकी घटनाओं के लिए संसद को जनता से माफी मांगनी चाहिए।"

उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व से ईमानदार आत्मचिंतन की मांग की और सरकार के उस दावे को खारिज किया कि पाकिस्तान ने किसी भारतीय संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया।
मनोज झा ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) के बयान पर सवाल उठाए, "NSA ने कहा कि भारत को एक शीशे का टुकड़ा भी नहीं खोना पड़ा। क्या पूंछ और राजौरी के लोग शीशे से कम हैं? खोई जिंदगियों का जिक्र क्यों नहीं?" उन्होंने सरकार की पारदर्शिता की कमी को भी उजागर किया और कहा कि खुफिया एजेंसियों के पास हमले की पूर्व जानकारी थी, लेकिन कार्रवाई पर अब तक अंधेरा है।
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मनोज झा ने जोर देकर कहा, "राष्ट्रीय एकता को दुख की घड़ी में शील्ड बनाकर सरकार को जवाबदेही से बचना गलत है।" उन्होंने सेना और राजनीति के बीच अंतर रेखांकित करते हुए कहा, "हमारी सेना में न धर्म है, न विचारधारा, सिर्फ तिरंगा है। यही हमारा रास्ता होना चाहिए।"
पहलगाम हमले के बाद एक विवादास्पद भाजपा पोस्ट का जिक्र करते हुए मनोज झा ने कहा, "एक हैंडल ने लिखा, 'उन्होंने धर्म पूछा, जाति नहीं।' इससे भारत माता को ठेस पहुंची। आतंकवादी यही चाहते थे, लेकिन हमारी मिट्टी ने नफरत को फैलने नहीं दिया।" उन्होंने सोफिया कुरैशी और व्योमिका सिंह जैसे नागरिकों की एकता और गर्व को सराहा।
झा ने केंद्र की आतंकवाद की घटनाओं को यूपीए से तुलना करने की आलोचना की, "मानव जीवन संख्या नहीं, उनका नुकसान गहरा दर्द है। राजनीति के लिए सेना के बलिदान का इस्तेमाल गलत है।"
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उन्होंने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयान और सरकार की संचार रणनीति पर सवाल उठाए, "सरकार राष्ट्र नहीं है। देश बना रहे, पार्टियां आती-जाती रहेंगी।"
मनोज झा ने नेहरू का बार-बार जिक्र करने और मंत्रिमंडल की संवैधानिक जिम्मेदारी में कमी को भी निशाना बनाया। उन्होंने कश्मीरियों की एकजुटता और घरेलू कूटनीति की जरूरत पर जोर दिया।