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इससे पहले केंद्रीय दूरसंचार विभाग ने जो निर्देश जारी किए थे, उसके मुताबिक फोन में इसके फीचर को रोका या हटाया नहीं जा सकता. सरकार के इस फैसले का तीखा विरोध शुरू हो गया था. मुख्य रूप से विपक्षी दल के नेता इसे लेकर सरकार पर हमलावर थे.
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केंद्र सरकार ने सभी नए स्मार्टफोन में मार्च 2026 से ‘संचार साथी’ ऐप को अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करने का आदेश दिया है। दूरसंचार विभाग (DoT) का दावा है कि यह कदम साइबर फ्रॉड, फर्जी IMEI, चोरी के फोन और फेक सिम को रोकने के लिए है। लेकिन विपक्ष ने इसे “पेगासस प्लस प्लस” और “निजता पर हमला” करार देते हुए हमलावर रुख अख्तियार कर लिया है।
संचार साथी क्या है?
- मई 2023 में शुरू हुआ सरकारी पोर्टल, जनवरी 2025 में ऐप बना।
- अभी तक 5 करोड़+ डाउनलोड।
- मुख्य सुविधाएं:
- CEIR: चोरी/गुम हुए फोन ब्लॉक-ट्रैक करना (अक्टूबर 2025 तक 52,000+ फोन रिकवर)
- TAFCOP: एक नाम पर कितने सिम सक्रिय, उसकी जानकारी
- फ्रॉड नंबर रिपोर्ट करना
- IMEI वैरिफिकेशन
- सरकार का दावा: ऐप पूरी तरह सुरक्षित है, कोई जासूसी नहीं करता।
सरकार का नया आदेश (1 दिसंबर 2025)
- मार्च 2026 से सभी नए एंड्रॉयड और iOS फोन में प्री-इंस्टॉल अनिवार्य।
- पुराने फोन में OTA अपडेट के जरिए आएगा।
- ऐप को अनइंस्टॉल या डिसेबल नहीं किया जा सकेगा (पहले यह संभव था)।
- मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बाद में सफाई दी: “ऐप डिलीट किया जा सकता है, मैंडेटरी नहीं है।”
विपक्ष का तीखा हमला
कांग्रेस, TMC, CPM, AAP ने एक स्वर में विरोध किया:
- कार्ति चिदंबरम (कांग्रेस सांसद): “ये पेगासस प्लस प्लस है। बिग ब्रदर हमारे फोन में घुसेगा और निजी जिंदगी में ताक-झांक करेगा।”
- केसी वेणुगोपाल (कांग्रेस महासचिव): “आर्टिकल 21 का खुला उल्लंघन। प्राइवेसी का अधिकार छीना जा रहा है।”
- जॉन ब्रिटास (CPM सांसद): “जिनके फोन में ऐप नहीं होगा, उन्हें वोटर लिस्ट से हटा दो। पेगासस महंगा था, अब घर-घर मुफ्त बांट रहे हैं!”
- महुआ मोइत्रा (TMC): “1984 का ऑरवेलियन भारत आ गया।”
- राघव चड्ढा (AAP): “साइबर सुरक्षा के नाम पर साइबर जासूसी।”
प्राइवेसी एक्सपर्ट्स की चिंता
- ऐप इंस्टॉल करते समय मांगता है:
- लोकेशन, कॉन्टैक्ट्स, कॉल लॉग, SMS, कैमरा, माइक्रोफोन, स्टोरेज जैसी 15+ परमिशन
- डिवाइस और नेटवर्क एक्टिविटी तक पहुंच
- साइबर लॉ एक्सपर्ट पवन दुग्गल: “इतनी परमिशन का दुरुपयोग हो सकता है। सरकार को डेटा कलेक्शन की सीमा और उद्देश्य स्पष्ट करना चाहिए।”
- इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF): “अनिवार्य प्री-इंस्टॉल करना डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के सिद्धांतों का उल्लंघन है।”
शशि थरूर ने अपनाया मध्यम मार्ग
कांग्रेस के ही शशि थरूर ने बीच का रास्ता सुझाया: “ऐप उपयोगी हो सकता है, लेकिन वैकल्पिक होना चाहिए। डेमोक्रेसी में जबरन थोपना गलत है। सरकार को पारदर्शी तरीके से बताना चाहिए कि डेटा कहां स्टोर होगा, कौन एक्सेस करेगा।”
सरकार की सफाई
- दूरसंचार सचिव नीरज मित्तल: “ऐप में कोई बैकडोर नहीं है। यूजर डेटा एन्क्रिप्टेड रहेगा।”
- DoT के अधिकारी: “पेगासस से तुलना बेतुकी है। पेगासस जीरो-क्लिक स्पाइवेयर था, संचार साथी यूजर के सामने है और सिर्फ फ्रॉड रोकने के लिए है।”
- मंत्री सिंधिया (2 दिसंबर शाम का बयान): “गलतफहमी है। यूजर चाहे तो डिलीट कर सकता है। हम सिर्फ लोगों को सुरक्षित करना चाहते हैं।”
अब आगे क्या?
- विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी शुरू कर दी है।
- कई सिविल सोसाइटी संगठनों ने जनहित याचिका दायर करने का ऐलान किया।
- स्मार्टफोन कंपनियां (Samsung, Xiaomi, Apple इंडिया) चुप हैं, लेकिन मार्च 2026 की डेडलाइन से पहले उन्हें स्पष्ट दिशानिर्देश चाहिए।
सवाल वही पुराना है — साइबर सुरक्षा के नाम पर कितनी निजता छोड़नी पड़ेगी? और क्या संचार साथी वाकई जनता का साथी बनेगा या सरकार का जासूस? अभी जवाब किसी के पास नहीं है।